
पहले पन्ने का हमेसा ज़िक्र था वो आदमी
आखरी अंजाम से बे-फिक्र था वो आदमी
न बहुत, थोड़ा मगर मगरूर था वो आदमी
इल्म के बाबद हुआ मजबूर था वो आदमी
उनकी आंखों का रौशन नूर था वो आदमी
सामने होकर भी कितना दूर था वो आदमी
कहने वाले कह गए, बेजोर था वो आदमी
खोखले चट्टान सा कमजोर था वो आदमी
आज शरहद पे खड़ा पछता रहा है, देख लो
चार काँधों पर टीका लो जा रहा है आदमी
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